शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

सूरज के चले जाने तक .......

दूर क्षितिज पर
धुंधल चुके ,
साथ खर्च हुए
सारे पल .

फिर भी

सूरज के जाते ही,
मन में होता 
कोलाहल .

वो बातें

अधूरी भी न लगी थीं,
लेकिन छुट गई
कुछ बातें .

वरना

सारे समझौतों के,
आगोश में, यूँहीं
न जागती काली रातें.

गनीमत कि

हर सुबह ,
एक रौशन टुकड़ा
चेहरे पर फिसलता है.

रात को ख़तम कर

मेरे भीतर ,
सुबह का
उजाला  भरता है.

और साथ

उस उजाले के ,
मैं जी लेता हूँ
सूरज के चले जाने तक .......


बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

तेरे भीतर

तेरे भीतर मैंने
एक अक्श तराशा है
बेहद नजाकत से


जीने सपनों को 
जो टूट चुके 
मेरी तलाश के द्वार 


हर रोज तराशता हूँ 
तेरे भीतर चुपके से
बेहद अपना सा समय


जो बीत गया
बिखर गया
समय के साथ
  

चाह नहीं 
मर्यादाओं की दुर्गन्ध में
जीने उस समय को


तुझसे से दूर 
जीना चाहता हूँ 
वो समय तेरे ही भीतर.








 

आखरी...

आखरी दस्तक 
मेरे दरवाजे पर 
आखरी बोल 
मेरे कानों पर 

वो आखरी सन्देश
आखरी मुलाकात का
आखरी गुस्सा 
तेरे टूट जाने का 

आखरी कड़वे बोल 
घर से चले जाने को
दर्द भरी चेतावनी 
लौट के न आने की

बेहद रुखा 
वो आखरी संवाद 
झुलसता, पिघलता 
वो साथ आखरी.

सोमवार, 27 जून 2011

दीवारों के पार

लाजमी है
अब तुम 
बारिश से
अपना दामन
बचाती होगी


लेकिन
छुप-छुप कर ही सही
अपनी सांसो को
नम यादों से
भिगाती होगी


हाँ
रिश्तों की जकड़
कैद कर सकती है
तुम्हारी देह


तुम 
अपनी रूह 
कभी तो 
दीवारों के पार
ले जाती होगी 

मंगलवार, 21 जून 2011

एक अदद पति और पिता

जेहेन में छाए,
सारे कामों को निपटाकर
जब लौटता हूँ, हर शाम


वीरान पाकर, मन को
कुछ यादें सवार  हो जाती हैं
चीखती हैं, चिल्लाती हैं


और हर बार
तेज बहुंत तेज, भागता हूँ
निरर्थक, दीशाहीन


इस दौड़-भाग में
मन का एक कोना
जगमगा जाता है
किसी रौशन याद से


फिर होंठो पर
थिरकने लगते हैं
जाने-पहचाने से शब्द
गानों की तरह


घर के भीतर जाने से पहले
जिन्हें फ़ेंक आना होता है
हमेशा की तरह
घर की देहलीज से बहुंत दूर


मिटानी होती है
मन पर काबिज रौशनी
की मैं लग संकू
एक अदद पति और पिता 

सोमवार, 20 जून 2011

माँ

माँ कुछ पंक्तियों में अपना Confession लिख रहा हूँ .....बहुत कुछ याद आ रहा है.......तेरी गोद, तेरे हाथ के निवाले, माथे पर तेरे होठो के स्पर्श, मेरी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए तेरी बेतहाशा दौड़ और मेरी उन जरूरतों को पूरा करने के बाद तेरे चेहरे की चमक. जानता हूँ, जितना भी याद कर लूँ बहुत कुछ छुट जायेगा.

 
गर्भ में समाते ही
उसकी दुनिया में आते ही
मैंने बदल दिया
बहुत कुछ, हमेशा के लिए


उसकी प्राथमिकताएँ
खान-पान, इच्छाएं
अस्तित्व का अर्थ
उसकी पहचान
क़दमों का अनुशासन
फिर उसका नाम


सब कुछ बदल जाने का
क्रम चलता जा रहा था
उसके अस्तित्व को बदल
मैं आकार पा रहा था........




बनते- बनते
कभी कोसा कभी रुलाया
अपने वर्तमान के लिए
उसे दोषी ठहराया


और बन गया
एक अदद आदमी
रोज कुछ नया पाते
गर्व से उसे सुनाते...


फिर अपने सुनने वाले
कान बदल लिए
जिंदगी के नए माने
खुद गढ़ लिए


इन मायनों में वो
खुद को तलाशती रही
गुम थी फिर भी
दुआओं से तराशती रही


कि रोज पा सकूँ मैं
नया सुखद स्वरुप
और वो बनी रहे माँ
मेरी आवश्यकताओं के अनुरूप



बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

स्पर्श... जो हुआ नहीं

तेरा आना
नीरव आकाश में
एक चिड़िया की तरह
और चला जाना
बिना गुनगुनाए
कोई गीत.


और मेरा खो जाना
सपनों में, 
तेरे होंठो से
मेरी आत्मा तक,
उस स्पर्श के एहसास में
जो अब तलक हुआ नहीं.