रविवार, 14 मार्च 2010

मुझे पता था .... दोगे दस्तक ....

मुझे पता था, दोगे दस्तक

मेरी देहरी, तुम आओगे


पाकर मुझे, मेरे द्वार

अपने ही भीतर, छुप जाओगे


आज अचानक, तुम आए

भौचक थोड़े, थोड़े शरमाए


चित्त नग्न था, मन था आतुर

तुम थे शांत, नजर झुकाए


मै भी अब तक, हर दिन हर पल

देख रहा था, राह तुम्हारी


इस पल को, जी भर जीने की

कर रहा था, कब से तैयारी


पर जाने क्यों, सहम गया था

सहज नहीं था, क्यों जाने


बिखर गया मै, बिन ठोकर के

तोड़ सजीले, ताने-बाने


आए तुम, और चले गए

जैसे अपरिचित, अनजाने


जैसे मिले हों, आज हम-तुम

भटके रिश्तों की, चिता जलाने।


शुक्रवार, 12 मार्च 2010

उमड़-घुमड़


कभी अकेली साँझ मन की खाली कोठी में कुछ गा जाती है,


इस दौड़-भाग में भीड़-भाड़ में याद तुम्हारी आ जाती है।


--------------------------------------------------------



हा सच है उनकी आँखे कुछ ज्यादा नम है,


पर ऐसा नहीं की हमें उनके जाने का गम कम है,


शायद वो किफायत से आंसू बहाते रहे अब तक,


और कहते है हमारी आँखों में आंसू कम है.

शनिवार, 6 मार्च 2010

हड़बड़ी में .........


हर आहट पर तेरी याद, काश शोर हो हरदम कोई आहट न हो
हर सपने में तेरा साथ, काश दीन न ढले कभी , रात न हो
हर धड़कन में तू ही तू , काश तू हो मेरी या साँस न हो

सरल, सहज मीठा सा प्यार.


एक चुप-चाप सड़क पर दौड़ रहा, मै लेकर दिल में सन्नाटे,


न चाह कि कोई हमसफर हो, न चाहूँ चेहरे परिचित मुस्काते।


न चाहूँ शब्दों का कोलाहल न उनके पीछे भटके अर्थ,


न चाहूँ सर पर फिसलते हाँथ न उनके पीछे के झूठे तर्क।


बस खोज रहा हूँ तुतलाते से निर्मल शब्दों का सा संसार


खोज रहा हूँ कुछ आँखों में सरल, सहज मीठा सा प्यार.