शनिवार, 4 अप्रैल 2009

मरहमी गीतों को मैंने खो दिया


कुछ चीजें बहुंत याद आती हैं... न चाहकर भी सबसे खास बनकर चिपक सी जाती है ...शाश्वत अंश की तरह। जिनका जीवन से चला जन मानो सब कुछ खो देना हमेशा के लिए। यकीं मानिये उन्हें हासिल करना मुमकिन नही।
जब होंठ यारों के नाम बुदबुदाते हैं और उँगलियाँ उन्हें गिनने को मुड़ने लगती हैं ... सारी उँगलियों के मुड़ने से बहुत पहले ही होंठ रुक जातें हैं और आँखे कुछ तलाशने लगती हैं । मन कांपने लगता है उस नीरस एकाकी अट्टहास से जिसके शोर में कुछ बेहद बेशकीमती मरहमी गीतों को मैंने खो दिया । काश उन बीते लम्हों से मैं नफरत कर पाता या कम से कम प्यार तो न करता काश मैं सुन पाता उन गीतों को जो मेरे लिए मेरे बुरे समय में गुनगुनाये गए काश..................