दूर क्षितिज पर
धुंधल चुके ,
साथ खर्च हुए
सारे पल .
फिर भी
सूरज के जाते ही,
मन में होता
कोलाहल .
वो बातें
अधूरी भी न लगी थीं,
लेकिन छुट गई
कुछ बातें .
वरना
सारे समझौतों के,
आगोश में, यूँहीं
न जागती काली रातें.
गनीमत कि
हर सुबह ,
एक रौशन टुकड़ा
चेहरे पर फिसलता है.
रात को ख़तम कर
मेरे भीतर ,
सुबह का
उजाला भरता है.
और साथ
उस उजाले के ,
मैं जी लेता हूँ
सूरज के चले जाने तक .......
धुंधल चुके ,
साथ खर्च हुए
सारे पल .
फिर भी
सूरज के जाते ही,
मन में होता
कोलाहल .
वो बातें
अधूरी भी न लगी थीं,
लेकिन छुट गई
कुछ बातें .
वरना
सारे समझौतों के,
आगोश में, यूँहीं
न जागती काली रातें.
गनीमत कि
हर सुबह ,
एक रौशन टुकड़ा
चेहरे पर फिसलता है.
रात को ख़तम कर
मेरे भीतर ,
सुबह का
उजाला भरता है.
और साथ
उस उजाले के ,
मैं जी लेता हूँ
सूरज के चले जाने तक .......
