रविवार, 6 सितंबर 2009

सन्नाटों में संगीत बरबस ही उपज जाता है..........


सन्नाटों में संगीत बरबस ही उपज जाता है,


जो रात लम्बी होने लगे और कोई रास्ता न हो।


सांसो को कुछ मकसद मिल ही जाता है,


जो तलाश लम्बी हो और मकसद की परिभाषा न हो।



कल्पनाओं के भंवर में बह जाता है मन बार-बार,


जो जिंदगी के आकाश में अवकाश की प्रत्याशा न हो।


बन जाते है मधुर-सुमधुर गीत यु ही,


जो एकमुश्त जानलेवा दर्द की आशा न हो.

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

कोई तो आकर दफ्न चीजो को छुपा ले ....


मन में एक तूफान है


सब कुछ उड़ाने को


डरता हूँ ये तूफान


न जाने क्या उड़ा ले


क्या दिखा दे ....


कभी कुछ जो सहेजा था


न जाने कब दफन हुआ


कोई तो आकर


दफ्न चीजो को छुपा ले


मुकम्मल मिटा दे .........

सोमवार, 24 अगस्त 2009

मन छन्न से बिखर जाता है उस फर्श पर ....










उस रूहानी एहसास की बड़ी याद आती है
जब कंधे होते कुछ हलके, बरबस सताती है
जब सब कुछ बीत-मिट रहा है, तेज बहुत तेज
तब वो याद नर्म ओस सी, चुपके लौट आती है



कैसे बयां करूं उन यादों की महक मैं
उस महक की दास्ताँ, बहूत रुलाती है
मन छन्न से बिखर जाता है उस फर्श पर
जिस पर मेरी दुनिया अब दौड़ लगाती है

सब के अपने आँगन .....


सब की अपनी दुनिया
अपने प्यारे लोग
सब के अपने सपने
और सपनों के संजोग

सबकी अपनी आशाएं
सबकी अपनी उम्मीद
सब का अपना संघर्ष
सब की अपनी जीत

सब के अपने आँगन
और साँझ के दीप
सबकी अपनी पूजा
सबके देव गीत

सबके अपने रिश्ते
और रिश्तो का अपना भाव
अपना परिभाषित समर्पण
और उस परिभाषा का चाव

सबके अपने आंसू
सबके अपने घांव
सबके अपने मरहम
अपनी सब की छांव

सबके अपने शेष जन
और अपने नाते शेष
सबकी अपनी कड़वाहट
स्नेह, प्रेम, राग - द्वेष

बुधवार, 12 अगस्त 2009

मन में मिटते गीत ..............

दिल क्यों तन्हा है क्यों तन्हा है सफ़र
रौशनी में डूबा मन क्यूँ धुंधला है इस कदर
क्यूँ भीतर का उजाला बाहर नहीं आता
क्यूँ साँझ का मुसाफिर मंजिल नही पाता
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अँधेरा सो रहा है शायद, बड़ी लम्बी ये रात है.
मन जल रहे है धू-धू कैसी कड़वी ये बात है.
कुछ ऐसा करो ऐसा कहो की मन दिए से जलें.
अँधेरा भाग जाए और दिल की रोशनी से डरे.
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किससे कहें कैसे कहें मन के दर्द?
कैसे दिखाएँ औरो को सपनो की गर्द?
कैसे बताएं गर्द से ढका क्या है?
कैसे कहें दर्द की दवा क्या है?
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बंद कमरे में अनजाना सा शोर बहुत है, पिघल चुकी आहट चितचोर बहुत है
जाने को कहा पर पाने पर जोर बहुत है, ये फौलादी मन कमजोर बहुत है

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

मरहमी गीतों को मैंने खो दिया


कुछ चीजें बहुंत याद आती हैं... न चाहकर भी सबसे खास बनकर चिपक सी जाती है ...शाश्वत अंश की तरह। जिनका जीवन से चला जन मानो सब कुछ खो देना हमेशा के लिए। यकीं मानिये उन्हें हासिल करना मुमकिन नही।
जब होंठ यारों के नाम बुदबुदाते हैं और उँगलियाँ उन्हें गिनने को मुड़ने लगती हैं ... सारी उँगलियों के मुड़ने से बहुत पहले ही होंठ रुक जातें हैं और आँखे कुछ तलाशने लगती हैं । मन कांपने लगता है उस नीरस एकाकी अट्टहास से जिसके शोर में कुछ बेहद बेशकीमती मरहमी गीतों को मैंने खो दिया । काश उन बीते लम्हों से मैं नफरत कर पाता या कम से कम प्यार तो न करता काश मैं सुन पाता उन गीतों को जो मेरे लिए मेरे बुरे समय में गुनगुनाये गए काश..................

मंगलवार, 10 मार्च 2009

जब साँझ सुबह हो गयी...


कहानी कुछ पाने से शुरू हो तो बेहतर है ...
जो मुझे जानते हैं, आज वास्ता उनसे है।
बचपन कब चला गया ठीक ठीक पता नही. जवानी की दस्तक हुई ...ढेर से सपने , निराधार उम्मीदे और ऐसी ही कुछ और चीजे जेहन में जोर मारने लगी। जल्द ही यथार्थ के कड़े धरातल का स्पर्श हुआ । पहले चखे हुऐ खट्टे बेर जानलेवा दर्द बन गये ।
तकलीफ में हर किसी को रस्म की तरह कुछ सहारा मिल ही जाता है ...मेरी झुलसती उम्मीदों को मानो बारिश (वर्षा) ने तर कर दिया। उस सहारे ने मुझे कोमल कर दिया और मेरे धरातल को और भी कठोर।
शायद गलती मेरी थी ...मैंने जिसे झोका समझा वो तेज आंधी थी जिसे तबाही कर जाना ही था, वो गई और मन की वो गर्द भी उड़ा ले गयी जो मेरे जीवन में लम्बी अँधेरी रात लेकर आने को थी । उसके जाने का गम न जाने क्यो मारे जा रहा था लेकिन आज लगता है सब कुछ ठीक हुआ वो साँझ जिसके बाद अँधेरी रात का अंदेशा था वो साँझ सुबह हो चुकी थी