शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

सूरज के चले जाने तक .......

दूर क्षितिज पर
धुंधल चुके ,
साथ खर्च हुए
सारे पल .

फिर भी

सूरज के जाते ही,
मन में होता 
कोलाहल .

वो बातें

अधूरी भी न लगी थीं,
लेकिन छुट गई
कुछ बातें .

वरना

सारे समझौतों के,
आगोश में, यूँहीं
न जागती काली रातें.

गनीमत कि

हर सुबह ,
एक रौशन टुकड़ा
चेहरे पर फिसलता है.

रात को ख़तम कर

मेरे भीतर ,
सुबह का
उजाला  भरता है.

और साथ

उस उजाले के ,
मैं जी लेता हूँ
सूरज के चले जाने तक .......


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