सोमवार, 27 जून 2011

दीवारों के पार

लाजमी है
अब तुम 
बारिश से
अपना दामन
बचाती होगी


लेकिन
छुप-छुप कर ही सही
अपनी सांसो को
नम यादों से
भिगाती होगी


हाँ
रिश्तों की जकड़
कैद कर सकती है
तुम्हारी देह


तुम 
अपनी रूह 
कभी तो 
दीवारों के पार
ले जाती होगी 

मंगलवार, 21 जून 2011

एक अदद पति और पिता

जेहेन में छाए,
सारे कामों को निपटाकर
जब लौटता हूँ, हर शाम


वीरान पाकर, मन को
कुछ यादें सवार  हो जाती हैं
चीखती हैं, चिल्लाती हैं


और हर बार
तेज बहुंत तेज, भागता हूँ
निरर्थक, दीशाहीन


इस दौड़-भाग में
मन का एक कोना
जगमगा जाता है
किसी रौशन याद से


फिर होंठो पर
थिरकने लगते हैं
जाने-पहचाने से शब्द
गानों की तरह


घर के भीतर जाने से पहले
जिन्हें फ़ेंक आना होता है
हमेशा की तरह
घर की देहलीज से बहुंत दूर


मिटानी होती है
मन पर काबिज रौशनी
की मैं लग संकू
एक अदद पति और पिता 

सोमवार, 20 जून 2011

माँ

माँ कुछ पंक्तियों में अपना Confession लिख रहा हूँ .....बहुत कुछ याद आ रहा है.......तेरी गोद, तेरे हाथ के निवाले, माथे पर तेरे होठो के स्पर्श, मेरी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए तेरी बेतहाशा दौड़ और मेरी उन जरूरतों को पूरा करने के बाद तेरे चेहरे की चमक. जानता हूँ, जितना भी याद कर लूँ बहुत कुछ छुट जायेगा.

 
गर्भ में समाते ही
उसकी दुनिया में आते ही
मैंने बदल दिया
बहुत कुछ, हमेशा के लिए


उसकी प्राथमिकताएँ
खान-पान, इच्छाएं
अस्तित्व का अर्थ
उसकी पहचान
क़दमों का अनुशासन
फिर उसका नाम


सब कुछ बदल जाने का
क्रम चलता जा रहा था
उसके अस्तित्व को बदल
मैं आकार पा रहा था........




बनते- बनते
कभी कोसा कभी रुलाया
अपने वर्तमान के लिए
उसे दोषी ठहराया


और बन गया
एक अदद आदमी
रोज कुछ नया पाते
गर्व से उसे सुनाते...


फिर अपने सुनने वाले
कान बदल लिए
जिंदगी के नए माने
खुद गढ़ लिए


इन मायनों में वो
खुद को तलाशती रही
गुम थी फिर भी
दुआओं से तराशती रही


कि रोज पा सकूँ मैं
नया सुखद स्वरुप
और वो बनी रहे माँ
मेरी आवश्यकताओं के अनुरूप