बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

तेरे भीतर

तेरे भीतर मैंने
एक अक्श तराशा है
बेहद नजाकत से


जीने सपनों को 
जो टूट चुके 
मेरी तलाश के द्वार 


हर रोज तराशता हूँ 
तेरे भीतर चुपके से
बेहद अपना सा समय


जो बीत गया
बिखर गया
समय के साथ
  

चाह नहीं 
मर्यादाओं की दुर्गन्ध में
जीने उस समय को


तुझसे से दूर 
जीना चाहता हूँ 
वो समय तेरे ही भीतर.








 

आखरी...

आखरी दस्तक 
मेरे दरवाजे पर 
आखरी बोल 
मेरे कानों पर 

वो आखरी सन्देश
आखरी मुलाकात का
आखरी गुस्सा 
तेरे टूट जाने का 

आखरी कड़वे बोल 
घर से चले जाने को
दर्द भरी चेतावनी 
लौट के न आने की

बेहद रुखा 
वो आखरी संवाद 
झुलसता, पिघलता 
वो साथ आखरी.