मंगलवार, 21 जून 2011

एक अदद पति और पिता

जेहेन में छाए,
सारे कामों को निपटाकर
जब लौटता हूँ, हर शाम


वीरान पाकर, मन को
कुछ यादें सवार  हो जाती हैं
चीखती हैं, चिल्लाती हैं


और हर बार
तेज बहुंत तेज, भागता हूँ
निरर्थक, दीशाहीन


इस दौड़-भाग में
मन का एक कोना
जगमगा जाता है
किसी रौशन याद से


फिर होंठो पर
थिरकने लगते हैं
जाने-पहचाने से शब्द
गानों की तरह


घर के भीतर जाने से पहले
जिन्हें फ़ेंक आना होता है
हमेशा की तरह
घर की देहलीज से बहुंत दूर


मिटानी होती है
मन पर काबिज रौशनी
की मैं लग संकू
एक अदद पति और पिता 

1 टिप्पणी:

Deepak Thakur ने कहा…

bahut khub janab