सोमवार, 24 अगस्त 2009

मन छन्न से बिखर जाता है उस फर्श पर ....










उस रूहानी एहसास की बड़ी याद आती है
जब कंधे होते कुछ हलके, बरबस सताती है
जब सब कुछ बीत-मिट रहा है, तेज बहुत तेज
तब वो याद नर्म ओस सी, चुपके लौट आती है



कैसे बयां करूं उन यादों की महक मैं
उस महक की दास्ताँ, बहूत रुलाती है
मन छन्न से बिखर जाता है उस फर्श पर
जिस पर मेरी दुनिया अब दौड़ लगाती है

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