रविवार, 14 मार्च 2010

मुझे पता था .... दोगे दस्तक ....

मुझे पता था, दोगे दस्तक

मेरी देहरी, तुम आओगे


पाकर मुझे, मेरे द्वार

अपने ही भीतर, छुप जाओगे


आज अचानक, तुम आए

भौचक थोड़े, थोड़े शरमाए


चित्त नग्न था, मन था आतुर

तुम थे शांत, नजर झुकाए


मै भी अब तक, हर दिन हर पल

देख रहा था, राह तुम्हारी


इस पल को, जी भर जीने की

कर रहा था, कब से तैयारी


पर जाने क्यों, सहम गया था

सहज नहीं था, क्यों जाने


बिखर गया मै, बिन ठोकर के

तोड़ सजीले, ताने-बाने


आए तुम, और चले गए

जैसे अपरिचित, अनजाने


जैसे मिले हों, आज हम-तुम

भटके रिश्तों की, चिता जलाने।


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