बुधवार, 12 अगस्त 2009

मन में मिटते गीत ..............

दिल क्यों तन्हा है क्यों तन्हा है सफ़र
रौशनी में डूबा मन क्यूँ धुंधला है इस कदर
क्यूँ भीतर का उजाला बाहर नहीं आता
क्यूँ साँझ का मुसाफिर मंजिल नही पाता
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अँधेरा सो रहा है शायद, बड़ी लम्बी ये रात है.
मन जल रहे है धू-धू कैसी कड़वी ये बात है.
कुछ ऐसा करो ऐसा कहो की मन दिए से जलें.
अँधेरा भाग जाए और दिल की रोशनी से डरे.
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किससे कहें कैसे कहें मन के दर्द?
कैसे दिखाएँ औरो को सपनो की गर्द?
कैसे बताएं गर्द से ढका क्या है?
कैसे कहें दर्द की दवा क्या है?
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बंद कमरे में अनजाना सा शोर बहुत है, पिघल चुकी आहट चितचोर बहुत है
जाने को कहा पर पाने पर जोर बहुत है, ये फौलादी मन कमजोर बहुत है

2 टिप्‍पणियां:

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह ने कहा…

You hgave a good talent as poet,written beautiful lines.
My heartly appriciations.
Yours ,
Dr.bhoopendra

Vipin Behari Goyal ने कहा…

बहुत अच्छी रचना है

तेज धूप का सफ़र